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श्रावण द्वादशी मंगलवार को भक्त शिरोमणि मोहनदास जी भगवत भजन में इतने लीन हो गए कि उन्होनें घी और सिंदूर से मूर्ति को श्रृंगारित कर दिया और उन्हें कुछ ज्ञात भी नहीं हुआ। उस समय बाला जी का पूर्व दर्षित रूप जिसमें वह श्रीराम और लक्ष्मण को कंधे पर धारण किए थे, अदृश्य हो गया। उसके स्थान पर दाढ़ी-मूंछ, मस्तक पर तिलक, विकट भौंहें, सुंदर आंखें, पर्वत पर गदा धारण किए अदभुत रूप के दर्शन होने लगे। इसके बाद शनैःशनैः मंदिर का विकास कार्य प्रगति के पथ पर बढ़ता चला गया।